*सी.वी.रमन विश्वविद्यालय में ‘लोक में राम’ की गूंज दूसरे दिन लोक संस्कृति की मनमोहक छटालोक और कला संस्कृति में सबसे धनी राज्य है छत्तीसगढ़- संतोष चौबे*
*भाषा लोक कला और संस्कृति की सेवा कर रहा डॉक्टर सी वी रमन विश्वविद्यालय- धर्मजीत*
बिलासपुर। विश्वविद्यालय में आयोजित चार दिवसीय रमन लोक कला महोत्सव ‘लोक में राम 2026’ के दूसरे दिन कार्यक्रमों की शुरुआत छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भजन मंगलाचरण से हुई, जिसकी प्रभावी प्रस्तुति विद्यार्थियों ने दी। इसके बाद पुसौर से आई लगभग 200 वर्ष पुरानी रामलीला मंडली ने बाली–सुग्रीव युद्ध का सजीव मंचन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
बस्तर के सुदूर अंचल सुकमा से आए सहदेव नाग और उनके साथियों ने धुरवा मड़ई नृत्य तथा चंद्रगिरी धुरवामणि नाच की आकर्षक प्रस्तुति दी। बस्तर की लोक परंपराओं की जीवंत झलक ने सभागार में उपस्थित लोगों को अद्भुत अनुभूति से भर दिया। अग्रज नाटक दल ने श्रुति नाट्य का मंचन किया, वहीं श्री वैष्णव समूह की ओर से शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें ज्योति वैष्णव ने राम के अरण्यकांड की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। जगदलपुर से आए जयप्रकाश एवं साथियों ने भतरा लोक नाट्य के माध्यम से बस्तर की सांस्कृतिक समृद्धि को मंच पर साकार कर दिया। पूरे आयोजन के दौरान ऐसा प्रतीत हुआ मानो बस्तर की संस्कृति स्वयं आकर महोत्सव में रच-बस गई हो।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने उन्होंने कहा कि आज पूरे विश्व में भारतीय जीवन शैली खासकर आदिवासी जीवन शैली को देखा जा रहा है और उसका अनुसरण किया जा रहा है खासकर प्रकृति पूजा सहज जीवन शैली और व्यक्तित्व की सरलता इसका महत्वपूर्ण पहलू है। भारतीय जीवन शैली हमेशा मानवता की बात करती है उन्होंने कहा कि लोक ही जीवन में रस प्रदान करता है छत्तीसगढ़ राज्य निश्चित रूप से खनिज संपदा और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध है लेकिन इससे भी अधिक समृद्ध छत्तीसगढ़ अपनी लोक कला और संस्कृति के लिए है। मुख्य अतिथि धर्मजीत सिंह, विधायक तखतपुर, ने कहा कि लोककला समाज को जोड़ने का माध्यम है। राम की परंपरा लोकजीवन में रची-बसी है और ऐसे आयोजन सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने कहा कि राम हमारी आत्मा में बसे हुए हैं राम हमारे लोक में राम बसे हुए है और परलोक में जाने के लिए भी राम का सहारा लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कल संस्कृत साहित्य भाषा लोक कला और छत्तीसगढ़ की जीवन शैली की सेवा दो सी सी रमन विश्वविद्यालय कर रहा है। अति विशिष्ट अतिथि राजेश सूर्यवंशी ने कहा कि लोककला हमारी जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम है और युवा पीढ़ी की भागीदारी इसे और भी जीवंत बनाती है। और ज्ञान के इस मंदिर में यह ज्ञान सभी युवाओं को मिल रहा है।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रदीप कुमार घोष ने अपने उद्बोधन में कहा कि अकादमिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण भी शिक्षा का महत्वपूर्ण
हिस्सा है। ऐसे आयोजन में युवा और समाज बढ़ चढ़कर हिस्सा लें। इस अवसर पर उपस्थित विश्वविद्यालय के कुल सचिव डॉ अरविंद कुमार तिवारी ने कहा कि विश्वविद्यालय की स्थापना को देश तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की जीवन शैली कला संस्कृति और साहित्य को भी युवाओं से जोड़ना और उन्हें वैश्विक मंच तक स्थापित करना है इसी क्रम में यह महोत्सव आयोजित किया जाता है हम जल्द ही साजन को वैश्विक के स्तर तक ले जाएंगे। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन जयति चटर्जी ने किया। उन्होंने कहा कि जब हम अपनी कला संस्कृति से जोड़ते हैं तो हमारा व्यक्तित्व और भी समृद्ध होता है। युवाओं को व्यक्तित्व की समृद्धि की ओर ले जाने के लिए यह महोत्सव आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्राध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, संस्कृति प्रेमी, विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित रहे।
*छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की पहचान पर संगोष्ठी*
महोत्सव के दूसरे दिन वैचारिक सत्र में “छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की पहचान” विषय पर विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। रायपुर से आए संस्कृति एवं पुरातत्व वक्ता राहुल सिंह ने लोक को देशज और भार्गीय दो भागों में विभाजित करते हुए कहा कि भाषा संवाद का माध्यम है और संस्कृति हमारी पहचान का आधार है। इतिहास एवं पुरातत्व विशेषज्ञ जी. एल. गायकवाड ने कहा कि संस्कृति परंपरा से चलती है, उसे लिखित प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, जबकि इतिहास प्रमाणों पर आधारित होता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के वैदिक काल से आधुनिक काल तक के वैभव का उल्लेख किया।
छत्तीसगढ़ी साहित्य परिषद के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय का संदर्भ देते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध रही है। कम जनसंख्या वाला क्षेत्र होने के बावजूद छत्तीसगढ़ की लोक परंपराएं, नृत्य और लोकनाट्य पूरे देश को प्रभावित करते हैं।
सत्र के अंतिम चरण में हिंदी विभाग की डॉ. आंचल श्रीवास्तव के शोधग्रंथ छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य परंपरा और रतनपुरिया गम्मत का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। उपस्थित विद्वानों ने पुस्तक को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि लंबे समय बाद इस विषय पर गंभीर और उपयोगी कार्य सामने आया है, जो आने वाले वर्षों में शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा।

















